लेख सार : मानव जन्म लेकर हम दुनियादारी में ज्यादातर जीवन व्यर्थ कर देते हैं एवं मानव जीवन के मूल उद्देश्य से चूक जाते हैं । दुनियादारी का लाभ, भक्ति के लाभ के आगे बहुत गौण है । पूरा लेख नीचे पढ़ें -
प्रभु अलग अलग रूपों में होते हुए भी एक ही हैं । दुनिया के लोग अलग अलग हैं । इसलिए एक प्रभु से हम निभा सकते हैं क्योंकि प्रभु तो एक ही हैं पर इतनी बड़ी दुनिया से हम कैसे निभा पाएंगे ?
पहली बात, दुनिया हमारे दोष और कमियों को देखती है इसलिए दुनिया से रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं । प्रभु दोष और कमियां नहीं देखते इसलिए भक्त की भक्ति निरंतर कायम रहती है ।
उदाहरण स्वरूप दुनिया के रिश्ते स्थिर नहीं रहते । उनमें उतार चढ़ाव आते रहते हैं । आज किसी को हम अच्छे लगते हैं तो जरूरी नहीं की कल भी लगेंगे । आज का दोस्त कल दुश्मन भी बन जाता है । जिसकी आज बड़ाई हो रही है कल दुनिया उसकी बुराई करने से भी नहीं चूकेगी । दुनिया के रिश्ते को स्थिर रखना संभव नहीं । पता नहीं कौन हमारे किस व्यवहार से, किस बात से नाराज हो जाए । एक को खुश रखते हैं तो दूसरा नाखुश हो जाता है । सभी से सब समय तालमेल रखना असंभव है ।
एक बार मान भी लें कि सभी से तालमेल रख भी लिया तो क्या होगा, जीव को सब तरफ से बड़ाई मिलेगी । उसका अहंकार आएगा जो फिर उसका पतन करवाएगा । सबसे तालमेल रखकर वह जीव अपने जीवन के अंत में 2000 - 3000 व्यक्तियों को श्मशान यात्रा तक ला सकेगा । मृत्यु के बाद 12 दिनों तक उसकी बहुत बड़ाई होती रहेगी । फिर धीरे धीरे वह धूमिल होती जाएगी । पहले लोग सप्ताह में, फिर महीने में, फिर साल में 1 - 2 बार उसे याद करेंगे । दो-तीन पीढ़ी बाद कोई श्राद्ध पक्ष में याद कर ले तो भी गनीमत होगी । जरा सोचें हमें अपने सर-दादाजी (यानी दादाजी के दादाजी) के बारे में कितना पता है ।
जितना समय हम दुनिया से व्यवहार रखने में खर्च करते हैं उसका आधा समय भी प्रभु को दें तो हमारी भक्ति में अत्यधिक प्रगति होगी । प्रभु कमियां और दोष नहीं देखते अपितु उन कमियों और दोषों को मिटाते हैं । भक्ति के बल पर हमारे भीतर का शुद्धिकरण होता है और हम मन, कर्म, वाणी से निर्मल हो जाते हैं । पाप और विकार छूटते हैं और हम पवित्र हो जाते हैं । पवित्र आत्मा का ही प्रभु से मिलन होता है । भक्ति और भक्त सदैव के लिए अमर हो जाते हैं । जरा सोचें जितना हम अपने दादाजी के दादाजी के बारे में नहीं जानते उससे ज्यादा हमें भगवती मीराबाई के बारे में पता है जबकि भगवती मीराबाई से या उनके कुल से हमारा कोई रिश्ता नहीं है ।
दूसरी बात, प्रभु हमसे कभी रिश्ता नहीं तोड़ते चाहे भक्त भक्ति छोड़ भी दें । दुनिया छोटे से कारण पर हमारा साथ छोड़ देती है । दोनों के लिए एक उदाहरण देखें । श्रीमद् भागवतजी महापुराण में श्री अजामिलजी का चरित्र है । श्री अजामिलजी बड़े धर्मपरायण व्यक्ति थे । समाज में उनकी साख थी । लोग उनकी बड़ाई करते थे । फिर उनका पतन हुआ । वे वेश्यागामी हो गए, चोरी करने लगे, मदिरा के नशे में रहने लगे तो गाँव वालों ने उन्हें जाति से बहिष्कृत करके गाँव से भी दूर कर दिया । वे वेश्याओं के साथ गाँव के बाहर रहते थे । उनके पतन पर सभी ने उनका साथ छोड़ दिया । कल तक जो उनकी इज्जत करते थे आज वे उन्हें पत्थर मारने को तैयार थे । समाज हमारी बुराई से नफरत नहीं अपितु हमसे नफरत करने लगता है । प्रभु ने तो रावण से भी नफरत नहीं की । उसकी बुराई के लिए उसे दंड दिया पर रावण से कभी द्वेष नहीं किया । अंत समय में तो प्रभु ने रावण को मोक्ष तक दे दिया क्योंकि प्रभु के श्रीहाथों से जिसका उद्धार होता है उसे मोक्ष ही मिलता है क्योंकि प्रभु के पास मोक्ष से कम कुछ है ही नहीं । अंत समय रावण को गुरुतुल्य मान प्रभु ने श्री लक्ष्मणजी को ज्ञान लेने रावण के पास भेजा । इतना बड़ा सम्मान प्रभु ने रावण को दिया । प्रभु ने श्री अजामिलजी की बुराइयों के बावजूद अंत समय में सिर्फ एक नाम उच्चारण के कारण उनको यमपाश से मुक्त करा दिया और अंत में दोबारा भक्ति के बल पर उन्हें अपने धाम बुलाया । श्री अजामिलजी ने प्रभु को छोड़ दिया था, भक्ति छोड़ दी थी, पतनोन्मुखी हो गए थे पर प्रभु ने उन्हें नहीं छोड़ा । उनकी भक्ति उनको वापस प्रदान की और उनका उत्थान करके उनको वह गति दी जो कि उनकी निंदा करने वालों को भी नहीं मिली । इस प्रसंग में दुनियादारी और भक्ति के गुण-दोष स्पष्ट दिखते हैं । दुनियादारी के दोष और भक्ति के गुण का एक बड़ा उदाहरण श्री अजामिलजी की कथा है ।
तीसरी बात, प्रभु सदैव जीव को निभाते हैं, दुनिया कदापि नहीं निभाती है । अगर मान भी लें कि निभाती है तो जितना प्रभु निभाते हैं उसका लेशमात्र भी नहीं निभा सकती । ऊपर वर्णित श्री अजामिलजी की कथा में यह भी स्पष्ट होता है । दुनिया के निभाने पर भी हमारा परलोक नहीं सुधर सकता । प्रभु हमारा इहलोक और परलोक दोनों सुधार देते हैं जैसे श्री सुदामाजी का सुधारा था, हमारे आवागमन को समाप्त कर देते हैं जैसे भगवती मीराबाई का किया था, हमारी पीढ़ियों को तार देते है जैसे श्री केवटजी का तारा था । दुनिया हमें थोड़ी-सी बड़ाई के शब्द से ज्यादा कुछ नहीं दे सकती । वह बड़ाई भी हमारे लिए आत्मघातक हो सकती है क्योंकि वह हमारे भीतर अहंकार को जन्म दे हमारा पतन करवा देती है ।
सारांश यह है कि जरूरत जितनी दुनियादारी रखें और अपना सम्पूर्ण ध्यान प्रभु पर केंद्रित करें । हम दुनियादारी में इतना समय व्यर्थ गंवा देते हैं कि प्रभु के लिए हमारे पास समय बचता ही नहीं । दुनियादारी पर खर्च किया समय हमें जीवन काल में एवं जीवन के बाद कुछ बड़ाई के शब्द दे देगा । इसके अलावा उसकी कोई क्षमता नहीं कि वह हमारा कुछ भला कर सके पर प्रभु की भक्ति हमें तार देती है । जीव का सर्वाधिक भला प्रभु की भक्ति ही करती है ।
इसलिए जीवन का अधिक से अधिक समय प्रभु को देना चाहिए । दुनियादारी साधारण रखनी चाहिए । किसी से द्वेष नहीं, सबका मंगल हो, सबका मंगल करने की इच्छा हो यहाँ तक की दुनियादारी रखना, यह श्रेष्ठ दुनियादारी होती है । इससे ज्यादा की जरूरत नहीं । इससे ज्यादा हम करते हैं तो वह व्यर्थ ही है ठीक वैसे जैसे एक बच्चा अपने पढ़ाई का समय खेलकर गंवा देता है और फिर परीक्षा में फेल हो जाए । अगर हम भी अपना मानव जीवन दुनियादारी में गंवा देगें तो जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाएंगे ।
मानव जीवन को सफल बनाना है तो ज्यादा समय, ज्यादा ऊर्जा, ज्यादा बल प्रभु भक्ति में लगाना ही होगा । इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है । स्वधर्म निभाते हुए प्रभु भक्ति करना, यही सबसे उचित मार्ग है, यही श्रीमद् भगवद् गीताजी का सार भी है ।