श्री गणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
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191 मानव जीवन का लक्ष्य क्या है ? (प्रभु के श्रीकमलचरणों में विश्राम पाना ही मानव जीवन का लक्ष्य है)
192 प्रभु प्राप्ति का अधिकार किसे है ? (प्रभु प्राप्ति का अधिकार सबको है)
193 माया से हमारी रक्षा कौन कर सकता है ? (प्रभु की कृपा ही माया से हमारी रक्षा कर सकती है)
194 अपनी रक्षा का दायित्व किस पर छोड़े ? (अपनी रक्षा का दायित्व प्रभु पर छोड़े)
195 किस अवस्था में प्रभु का सुमिरन अधिक होता है ? (प्रतिकूल अवस्था में प्रभु का सुमिरन अधिक होता है)
196 मानव जीवन ही प्रभु प्राप्ति के लिए उपयुक्त क्यों है ? (भक्ति के कारण मानव जीवन ही प्रभु प्राप्ति के लिए सबसे उपयुक्त है)
197 जीवन में किसकी प्रधानता होनी चाहिए ? (जीवन में भक्ति की प्रधानता होनी चाहिए)
198 कौन-सा कर्म करने से सच्चा पुण्य मिलता है ? (प्रभु के लिए कर्म करने से सच्चा पुण्य मिलता है)
199 प्रभु को कौन प्रिय है ? (सात्विक आचरण वाला जीव प्रभु को प्रिय होता है)
200 संपदा जीवन में कब टिकती है ? (प्रभु के आशीर्वाद से संपदा जीवन में टिकती है)
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191 मानव जीवन का लक्ष्य क्या है ? (प्रभु के श्रीकमलचरणों में विश्राम पाना ही मानव जीवन का लक्ष्य है)

मानव जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य क्या है । किसी के लिए धन-संपत्ति, किसी के लिए परिवार, किसी के लिए मौज-मस्ती, किसी के लिए कीर्ति मानव जीवन का लक्ष्य होता है । वे लोग उसी दिशा में जीवनभर कार्य करते हैं । पर शास्त्र कहते हैं कि मानव जीवन का सच्चा उद्देश्य प्रभु के श्रीकमलचरणों में विश्राम पाना है । दूसरे शब्दों में कहें तो हमेशा के लिए संसार की चौरासी लाख योनियों में आवागमन से मुक्त होना है । जीव का प्रयास इसी दिशा में होना चाहिए और इसके लिए ही उसे प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । पर माया हमें संसार में भ्रमित करके इस उद्देश्य पूर्ति से विपरीत कर्म हमसे करवाती है । प्रभु की माया की उलझन से बचना हो तो प्रभु की शरण में जाना ही पड़ेगा । जब हम भक्ति के बल पर प्रभु से प्रेम करने लगेंगे और प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपने मन को लगाने में सफल हो जाएंगे तो माया फिर हम पर अपना प्रभाव कभी नहीं डाल पाएगी । जीवन में माया और मायापति प्रभु के बीच से एक को चुनना पड़ता है पर दुर्भाग्यवश लोग माया के प्रभाव में आकर मायापति प्रभु को चुनना भूल जाते हैं । यह चूक बड़ी महंगी पड़ती है ।

इसलिए जीवनकाल में मानव जीवन के सच्चे लक्ष्य की तरफ हमें प्रयास करना चाहिए जिससे प्रभु के श्रीकमलचरणों में हमें स्थान मिल सके ।

192 प्रभु प्राप्ति का अधिकार किसे है ? (प्रभु प्राप्ति का अधिकार सबको है)

जैसे कोई बच्चा किसी आजाद राष्ट्र में जन्म लेता है तो उसे आजादी का अधिकार जन्म से ही प्राप्त हो जाता है । उसके लिए उसे अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता । वह उसे जन्मजात अधिकार के रूप में स्वतः ही मिल जाता है । वैसे ही कोई जीव मनुष्य योनि में जन्म लेता है तो प्रभु को पाने का दुर्लभ अधिकार उसे स्वतः ही प्राप्त हो जाता है । मानव जीवन ही है जिसमें जीव भक्ति कर सकता है और भक्ति करके प्रभु की प्राप्ति कर सकता है । मानव जन्म मिलने के बाद हमें यह देखना चाहिए कि हम अपने तन, मन और इंद्रियों को प्रभु प्राप्ति में लगाते हैं या उससे संसार करने में लगा देते हैं । हमें देखना चाहिए कि प्रभु की प्राप्ति के लिए मिला अति दुर्लभ मनुष्य जन्म हम कहीं संसार करने में व्यर्थ तो नहीं गंवा देते हैं । प्रभु के मार्ग पर चलते हुए हमें संसार में नहीं उलझना चाहिए क्योंकि संसार में उलझे व्यक्ति का प्रभु के मार्ग पर चलना बहुत कठिन होता है यानी लगभग असंभव होता है ।

इसलिए हमारे जीवन का लक्ष्य प्रभु प्राप्ति होना चाहिए जिसका अधिकार सबको मनुष्य जन्म लेने पर प्रभु ने देकर भेजा है ।

193 माया से हमारी रक्षा कौन कर सकता है ? (प्रभु की कृपा ही माया से हमारी रक्षा कर सकती है)

प्रभु की कृपा ही माया से हमारी रक्षा कर सकती है । प्रभु की कृपा ही एकमात्र रक्षा कवच है माया के प्रभाव से बचने का अन्यथा प्रभु की माया को क्षणभर से ज्यादा समय नहीं लगता हमें उलझाने में । माया क्षणभर में अपने मायाजाल में हमें उलझा लेती है । माया के प्रभाव में आते ही हम प्रभु से दूर हो जाते हैं जो कि जीवन की सबसे बड़ी हानि होती है । इस बड़ी हानि से बचाना है तो जीवन में प्रभु कृपा अर्जित करनी पड़ेगी । इसे अर्जित करने का साधन भक्ति है । भक्ति करने वाले जीव पर सदा प्रभु की कृपा रहती है और इस कारण वह माया के प्रभाव से बचा रहता है । माया उसके लिए निष्क्रिय हो जाती है और उस पर अपना प्रभाव नहीं डालती । इसके अलावा अन्य कोई भी विधि से माया से बचा नहीं जा सकता । प्रभु की माया ने सबको मोहित किया है और अपने मायाजाल में उलझाया है । इसलिए प्रभु की भक्ति करके प्रभु की कृपा अर्जित करना ही श्रेयस्कर होता है । इस तरह हम माया के प्रभाव से बच सकते हैं और प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपना स्थान बना सकते हैं ।

इसलिए जीवन में माया से रक्षा के लिए मायापति प्रभु की भक्ति करके उनकी कृपा अर्जित करनी चाहिए ।

194 अपनी रक्षा का दायित्व किस पर छोड़े ? (अपनी रक्षा का दायित्व प्रभु पर छोड़े)

हम अपने रक्षण का भार स्वयं उठाते हैं और पूरा जीवन चिंता में व्यतीत कर देते हैं । हम अपने रक्षण के लिए कितना समय और परिश्रम लगाते हैं फिर भी सफल नहीं हो पाते और विपत्ति में फंसते हैं । हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने रक्षण का भार प्रभु को नहीं देते और खुद ही अपने रक्षण के लिए श्रम करते हैं । पर जिस जीव की भीतर की आँखें खुल गई हैं वह प्रभु की भक्ति करके प्रभु की शरणागति ग्रहण कर लेता है और अपना पूरा दायित्व और जिम्मेदारी प्रभु को संभला देता है । इस तरह वह जीवनभर के लिए निश्चिंत हो जाता है । अपने स्वयं की चिंता करने से कहीं लाभप्रद है प्रभु का चिंतन करना और अपनी चिंता करने का दायित्व प्रभु पर सौंप देना । जब हम भक्त चरित्र पढ़ते हैं तो एक बार निश्चित पाएंगे कि सभी भक्तों ने अपने जीवन में प्रभु का चिंतन किया है और उनकी चिंता और रक्षण का काम प्रभु ने किया है ।

इसलिए जीवन में प्रभु की भक्ति करके अपने रक्षण का दायित्व प्रभु पर छोड़ना चाहिए ।

195 किस अवस्था में प्रभु का सुमिरन अधिक होता है ? (प्रतिकूल अवस्था में प्रभु का सुमिरन अधिक होता है)

जिसके पास अथाह धन-संपत्ति है उसके हृदय से प्रभु के लिए धन्यवाद कभी-कभी निकलता है । वे प्रभु को कभी-कभी याद करते हैं पर जो प्रतिकूल परिस्थिति में है वह प्रभु के भरोसे ही रहता है और उसे नित्य प्रभु की याद आती है । धनवान को धन का भरोसा रहता है जबकि प्रतिकूल परिस्थिति में रहने वाले जीव को प्रभु का ही एकमात्र भरोसा होता है । प्रतिकूल परिस्थिति में पल-पल प्रभु की याद आती है इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि से यह बहुत उपयोगी होता है । प्रतिकूल परिस्थिति में प्रभु का सुमिरन सभी करते हैं और सभी को प्रभु की याद आती है । सुख में कोई बिरला ही प्रभु को याद कर पाता है क्योंकि सुख में हम संसार में रम जाते हैं और प्रभु को भूल जाते हैं । यही कारण है कि भगवती कुंतीजी ने प्रभु से दुःख मांगा जिससे उन्हें प्रभु का सुमिरन निरंतर होता रहे और वे क्षणभर के लिए भी प्रभु को भूले नहीं । प्रभु को कभी नहीं भूलना, यह मानव जीवन की सच्ची कसौटी है ।

इसलिए प्रतिकूलता जीवन में आए तो कभी घबराना नहीं चाहिए और उसे प्रभु की तरफ मुड़ने का मार्ग मानकर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए ।

196 मानव जीवन ही प्रभु प्राप्ति के लिए उपयुक्त क्यों है ? (भक्ति के कारण मानव जीवन ही प्रभु प्राप्ति के लिए सबसे उपयुक्त है)

एक गिलहरी या कबूतर पूरे दिन और रात कितने डर में रहते हैं । उन्हें डर होता है कि कोई उन्हें मार न दे । वे भोजन जमा करके नहीं रख पाते और भोजन के लिए रोज उन्हें नया प्रयास करना पड़ता है । पर मनुष्य अगर सात्विक विचार वाला अच्छा जीवन जीता है तो उसे जीवन में कोई डर नहीं होता । गरीब-से-गरीब व्यक्ति के पास भी एक-दो दिन के भोजन की व्यवस्था तो होती है । इसलिए मानव जीवन ही प्रभु की भक्ति करके प्रभु को प्राप्त करने के लिए सबसे उपयुक्त जीवन माना गया है । सभी धर्मों के शास्त्रों का, सभी ऋषियों का, संतों का, भक्तों का, सभी अन्य धर्मों के आचार्यों का एकमत है कि प्रभु प्राप्ति के लिए सबसे उपयुक्त और श्रेष्ठ मानव जन्म ही है । पर मनुष्य का दुर्भाग्य देखें कि मानव जीवन मिलने पर वह सब कुछ करता है पर प्रभु प्राप्ति का प्रयास नहीं करता । वह भक्ति को अंत समय के लिए छोड़ देता है और जीवनभर धनरूपी कंकड़ की कमाई करता है और मोतीरूपी भक्ति की कमाई करने से वंचित रह जाता है ।

इसलिए मानव जीवन मिलने पर प्रभु की भक्ति ही करनी चाहिए क्योंकि यह मानव जीवन भक्ति करने के लिए सबसे उपयुक्त है ।

197 जीवन में किसकी प्रधानता होनी चाहिए ? (जीवन में भक्ति की प्रधानता होनी चाहिए)

संसार का सब कुछ करते हुए यानी संसार का सब व्यवहार करते हुए भक्ति नहीं हो सकती । संसार से वैराग्य होने पर ही भक्ति सिद्ध होती है । भक्ति होने पर संसार का सब कुछ अपने आप सिद्ध हो जाता है, पूर्ण हो जाता है । संसार का सब कार्य करने जाएंगे और भक्ति भी करेंगे तो भक्ति नहीं हो पाएगी । पर अगर सिर्फ भक्ति ही करते हैं तो संसार के सभी कार्य प्रभु कृपा से स्वतः ही होते चले जाएंगे और उनके लिए हमें अलग से श्रम करने की, प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी । ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में आश्वासन है कि वे अपने आश्रित भक्तों का योगक्षेम का वहन करते हैं । इसलिए जीवन में हमें भक्ति करनी चाहिए तो सांसारिक कर्तव्यों की पूर्ति प्रभु कृपा से स्वतः ही होगी । पर हम उल्टा करते हैं और संसारी कर्तव्य की पूर्ति के लिए जीवनभर प्रयास करते रहते हैं । इसमें हम पूर्ण रूप से सफल भी नहीं हो पाते और इसी उठापटक में हम भक्ति करने से भी वंचित रह जाते हैं ।

इसलिए जीवन में भक्ति को प्रधानता से अंजाम देना चाहिए और केवल दुनियादारी और सांसारिक गतिविधियों में अपने समय का व्यय व्यर्थ में नहीं करना चाहिए ।

198 कौन-सा कर्म करने से सच्चा पुण्य मिलता है ? (प्रभु के लिए कर्म करने से सच्चा पुण्य मिलता है)

प्रभु के लिए किया हर छोटा-से-छोटा कर्म, हर छोटा-से-छोटा परिश्रम, हर छोटी-से-छोटी क्रिया एक पुण्य देता है । जीवन में बड़े पुण्य करने का सौभाग्य किसी बिरले को ही मिलता है पर छोटे-छोटे पुण्य हम भी जीवन में निरंतर कमा सकते हैं । छोटे-छोटे पुण्य मिलकर इतने बड़े हो जाते हैं कि वे बड़े पुण्य से भी आगे निकल जाते हैं । जैसे बूँद-बूँद जल से घड़ा भर जाता है, जैसे धीरे-धीरे पर निरंतर चलने वाला कछुआ भी खरगोश से आगे निकल जाता है, वैसे ही छोटे-छोटे पुण्य जो हम जीवन में अर्जित करते चलते हैं वे बड़े पुण्यों से भी आगे निकल जाते हैं । इसलिए बड़े पुण्यों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए और छोटे-छोटे पुण्यों को कमाने का मौका जीवन में कभी नहीं चूकना चाहिए ।

सच्चा पुण्य वही है जो प्रभु को केंद्र में रखकर किए कर्म से मिलता है ।

199 प्रभु को कौन प्रिय है ? (सात्विक आचरण वाला जीव प्रभु को प्रिय होता है)

श्री सुंदरकांडजी में वर्णन है कि जो लंका की संपत्ति प्रभु श्री महादेवजी ने रावण को उसके शीश चढ़ाकर तपस्या करने पर दी, वही संपत्ति प्रभु श्री रामजी ने भक्त श्री विभीषणजी के निर्मल हृदय और सात्विक आचरण से प्रसन्न होकर दे दी । प्रभु का वास जब हमारे हृदय में भक्ति के कारण होता है तो वह निर्मल हो जाता है । फिर उस निर्मल हृदय में काम, क्रोध, मद, लोभ, बैर, मोह और द्वेष नहीं होते । ऐसे हृदयवाला अपना चित्त प्रभु के श्रीकमलचरणों में लगाने में सफल हो जाता है । प्रभु कहते हैं कि ऐसा करने वाला भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय होता है और वह प्रभु के हृदय में वैसे बसता है जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है । यानी अगर हम काम, क्रोध, मद, लोभ, बैर, मोह और द्वेष को भक्तिमय होकर त्याग दें और अपने मन को संसार से हटाकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पित कर दें तो हम पर भी प्रभु वैसे ही प्रसन्न होंगे जैसे श्री विभीषणजी पर हुए थे ।

इसलिए जीवन में सात्विक आचरण करके और भक्ति करके प्रभु का प्रिय बनना चाहिए तभी हमारा मानव जीवन सफल माना जाएगा ।

200 संपदा जीवन में कब टिकती है ? (प्रभु के आशीर्वाद से संपदा जीवन में टिकती है)

स्वर्णनगरी लंका को स्थाई रूप से पाने के लिए रावण की तपस्या से कहीं ज्यादा श्री विभीषणजी की भक्ति की जरूरत होती है । रावण द्वारा तपस्या से पाई लंका उसकी अनीति और पाप के कारण चली गई पर श्री विभीषणजी की भक्ति और सात्विकता के कारण उन्हें चिरकाल तक के लिए स्थाई रूप से प्रभु के आशीर्वाद स्वरूप लंका का राज्य मिल गया । इस दृष्टांत से स्पष्ट है कि संपदा जीवन में प्रभु के आशीर्वाद के कारण ही टिकती है । प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे बड़ा साधन भक्ति है । भक्ति करके अगर हम प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त कर लेते हैं तो हमारा कल्याण इहलोक और परलोक दोनों जगह निश्चित हो जाता है । जब भक्ति के कारण प्रभु में हमारा मन लग जाएगा तो अनीति या गलत आचरण हमसे नहीं होगा और पुण्य और सात्विक आचरण ही प्रभु कृपा से होंगे । नीति और पुण्य से अर्जित संपदा सदैव के लिए स्थाई रहती है ।

इसलिए जीवन में भक्ति करके प्रभु का आशीर्वाद पाने का प्रयास करना चाहिए तभी संपदा जीवन में टिकेगी ।