लेख सार : भक्त का हिसाब-किताब करने में प्रभु बड़े उदार होते हैं और करुणा और दया से उसका हिसाब करते हैं । पर अभक्त के हिसाब-किताब करने में प्रभु बड़े कठोर होते हैं और बिना किसी रियायत के उसका हिसाब करते हैं । पूरा लेख नीचे पढ़ें -
हम अपने कार्यालय या फैक्टरी के एक कार्यकुशल, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी का जब महीने का हिसाब करते हैं तो कुछ छुट्टी जो उसने ली है या कभी उसके देर से आने की स्थिति को अनदेखा कर उसे पूरा वेतन देते हैं । पर एक लापरवाह, कामचोर कर्मचारी के हिसाब के वक्त ऐसी कोई रियायत नहीं देते ।
प्रभु भी जीव का हिसाब-किताब करते वक्त कभी-कभी बहुत उदार यानी भूल-चूक माफ करने वाले और कभी कभी बहुत कठोर यानी पूरा नियम पालन करने वाले और कोई रियायत नहीं देने वाले बन जाते हैं ।
ऐसा कब होता है ? जब भक्त का हिसाब करने की बारी आती है तो प्रभु हिसाब में उदार बन जाते हैं । बहुत सारी विपरीत चीजों की अनदेखी कर उसके विपरीत कर्मफल को माफ कर देते हैं और बची हुई सारी विपरीत चीजों का कर्मफल इतना घटा देते हैं, मानो हिसाब में गलती कर रहें हो । यह सब प्रभु जानबूझकर करते हैं ।
क्यों करते हैं जानबूझकर ? क्योंकि भक्त के प्रति अपार स्नेह, प्रेम, दुलार और करुणा होती है प्रभु के अंदर । जैसे एक माता-पिता अपने पुत्र की गलतियां माफ करते हैं, अनदेखी करते हैं, वैसे ही परमपिता अपने भक्तों की गलतियां माफ करते हैं, अनदेखी करते हैं ।
कर्मचारी के उदाहरण से यह बात हम समझ सकते हैं । एक कार्यकुशल, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी है । हमेशा व्यापार और मालिक के हित में काम करता है । कभी कामचोरी, लापरवाही नहीं करता । हमेशा सतर्क रहकर, अपना स्वयं का काम समझकर कार्य करता है । कभी स्वयं की बीमारी के कारण छुट्टी करनी पड़ी या वर्षा के कारण आँफिस देर से पहुँचा और हाजरी रजिस्टर में इसका इंद्राज हो गया तो भी उसका मालिक महीने के अंत में इसकी अनदेखी करके उसे पूरा वेतन देता है क्योंकि उसे पता है कि यह उसने जानबूझकर नहीं किया, उसकी मजबूरी थी यानी बीमारी या वर्षा की मजबूरी । ऐसे ही प्रभु को पता है कि मेरे भक्त ने अगर कोई पातक, विपरीत कार्य किया है तो जानबूझकर नहीं किया, वह करना नहीं चाहता था पर पूर्व कर्मफलों के प्रभाव के कारण वह ऐसा करने पर बाध्य हुआ । अगर हमारे में भक्ति है जिसके कारण हृदय और अंतःकरण शुद्ध है तो हमसे जो पातक होता है प्रभु उसे माफ करते हैं । अगर प्रभु यह माफ नहीं करेंगे तो फिर नया कर्मफल बन जाएगा और फिर उसे भोगना पड़ेगा और नया जन्म लेना पड़ेगा । प्रभु अपने भक्तों को मुक्त करना चाहते हैं इसलिए ही उनके पातक माफ करते हैं ।
कोई यह सोचे कि प्रभु भक्त के पातक तो माफ करते हैं और अभक्त के नहीं, यह बड़ा भेदभाव है तो उसे यह समझना चाहिए कि वीटो का अधिकार प्रभु के पास सदैव ही है । प्रभु से बड़ा कोई नहीं । प्रभु जो करते है वही नियम है । जरा सोचें कि क्या आप एक लापरवाह कर्मचारी, झूठ बोलने वाले और हेरा-फेरी करने वाले कर्मचारी को कोई रियायत देंगे । कभी नहीं, क्योंकि वह रियायत का अधिकारी है ही नहीं । उसका कर्म ऐसा है कि ऐसे पुत्र को एक पिता भी रियायत नहीं देगा । ठीक वैसे ही परमपिता उसे रियायत नहीं देते जो सुधरने का अवसर मिलने पर भी सुधरता नहीं है ।
एक और उदाहरण लें कि एक पिता के दो पुत्र हैं । एक बड़ा मेहनती, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ है जो पिता की हर बात मानता है और उसके व्यवहार से पिता को कभी भी क्षोभ नहीं होता और पिता उससे खुश रहता है । उसके प्रति पिता का दृष्टिकोण अलग होगा । दूसरा पुत्र लापरवाह, बेईमान, कर्तव्यविहीन है जो पिता की बात नहीं मानता, जिसके व्यवहार से पिता को कष्ट पहुँचता है और पिता उससे दुःखी रहते हैं । उसके प्रति पिता का दृष्टिकोण अलग होगा । जीवन के किसी भी मोड़ पर पिता कर्तव्यनिष्ठ पुत्र का ही साथ देगा, बँटवारे के समय भी उसे अधिकारी मान ज्यादा-से-ज्यादा हिस्सा देगा ।
प्रभु भी तो ऐसा ही करते हैं तो फिर भेदभाव कहाँ है । जो अधिकारी है उसके साथ प्रभु उदार रहते हैं, उसे रियायत ज्यादा मिलती है । जो अनाधिकारी है उसके साथ प्रभु कठोर रहते हैं, उसके साथ पूरे नियम की पालना होती है ।
इसलिए प्रभु जब दुष्टों का हिसाब करते हैं तो पूरे नियम का पालन करते हैं । एक-एक चीज का हिसाब होता है । कोई भी भूल-चूक नहीं होती । दुष्ट थर्रा जाता है अपनी करनी और उसका सटीक हिसाब और कर्मफल देखकर । उसकी एक नहीं चलती । उसके हिसाब में दया, करुणा का कोई स्थान नहीं होता ।
एक उदाहरण महाभारत युद्ध का है जब कर्ण का रथ फँस गया था और प्रभु ने श्री अर्जुनजी को बाण चलाने का निर्देश दिया । तब कर्ण ने युद्धनीति का हवाला देकर उसे युद्धनीति के विरूद्ध बताया था । तब प्रभु ने उसे ऐसी खरी-खरी सुनाई की शर्म के मारे उसका सर झुक गया और वह उत्तरहीन हो गया । प्रभु का कहना मात्र इतना था कि नीति की दुहाई वही दे सकता है जो नीति पर चला हो । जिसने जीवन भर नीति का पालन नहीं किया वह अंत समय नीति की दुहाई दे, यह हास्यप्रद है ।
ऐसे ही एक दुष्ट अपने अंतिम समय प्रभु की दया या करुणा की दुहाई दे, यह हास्यप्रद है । उस दुष्ट ने जीवन भर प्रभु की दया और करुणा पाने का कोई प्रयत्न नहीं किया । उसके जीवन में कई अवसर आए प्रभु की दया और करुणा पाने के अवसर पर वह चूक गया । अब अंत में वह इसकी दुहाई देता है या भक्त को मिली करुणा और दया के कारण भेदभाव की बात करता है तो यह हास्यप्रद होगा । अगर हमें प्रभु की करुणा और दया की अपेक्षा है, अगर हमें पता है कि जीवन के अंत में इसकी जरूरत होगी तो अविलम्ब भक्तिमार्ग पर चलकर प्रभु की करुणा और दया अर्जित करना ही इसका एकमात्र उपाय है ।